Saturday, 30 March 2013

ओ कल्पवृक्ष की सोनजुही (O Kalpbrikh Ki Sonjuhi)


ओ कल्पवृक्ष की सोनजुही 

ओ कल्पवृक्ष की सोनजुही
ओ अमलताश की अमरकली
धरती के आतप से जलते
मन पर छाई निर्मल बदली
में तुमको मधुसदगन्ध युक्त संसार नहीं दे पाउॅंगा
तुम मुझको माफ करना तुम्हें मैं प्यार नहीं दे पाउॅंगा।

तुम कल्पवृक्ष का फूल और
मैं धरती का अदना गायक
तुम जीवन के उपभोग योग्य
मैं नहीं स्वयं अपने लायक
तुम नहीं अधुरी गजल शुभे
तुम शाम गान सी पावन हो
हिम शिखरों पर सहसा कौंधी
बिजुरी सी तुम मनभावन हो
इसलिये व्यर्थ शब्दों वाला व्यापार नहीं दे पाउॅंगा
तुम मुझको करना माफ तुम्हें मैं प्यार नहीं दे पाउॅंगा।

तुम जिस शयया पर शयन करो
वह क्षीर सिन्धु सी पावन हो
जिस आंगन की हो मौलश्री
वह आंगन क्या वृन्दावन हो
जिन अधरों का चुम्बन पाओ
वे अधर नहीं गंगातट हों
जिसकी छाया बन साथ रहो
वह व्यक्ति नहीं वंशीवट हो
पर मैं वट जैसा सघन छॉंह विस्तार नहीं दे पाउॅंगा
तुम मुझको करना माफ तुम्हें मैं प्यार नहीं दे पाउॅंगा।

में तुमको चॉद सितारों का
सौंपू उपहार भला कैसे
मैं यायावर बंजारा साधू
दूं सुर श्रंगार भला कैसे
मैं जीवन के प्रश्नों से नाता तोड़ तुम्हारे साथ शुभे
बारूद बिछी धरती पर कर लूं
दो पल प्यार भला कैसे
इसलिये विवश हर आंसू को सत्कार नहीं दे पाउॅंगा
तुम मुझको करना माफ तुम्हें मैं प्यार नहीं दे पाउॅंगा।

:—डॉ0 कुमार विश्वास (Dr. Kumar Viswas)