Wednesday, 6 March 2013

माँ (Maa)


हौले हौले ख्वाहिशों की उम्र वढने लगी तो, दिल में जवान कितने ही ख्वाव हो गये
और वक्त की शिकायतों पर रब की इनायतें थी, हमने जो देखे सपने गुलाब हो गये
कि दुनिया ने रख दिये पग पग पे सवाल, फिर भी इरादे सभी लाजबाब हो गये
जिन्दगी में और तो वसीला कुछ भी नहीं था, मॉ ने दी दुआयें हम कामयाब हो गये !

खूबसूरती किसी इमारत के गमलों की, जैस और भी निखरती है कांट छांट से
हम से यह बार बार बोलते हैं संस्कार, प्यार फैलता है अपनों में वरवांट से
हौले हौले घूंट घूंट दिल में उतरती है, जल की सुगंध जैसे मिटटी वाले मॉट से
हमने सही है इसलिये हम जानते हैं, जिन्दगी संवरती वुजुर्गों की डांट से !

देश के दुलारे जिस रास्ते से गुजरे हों ऐसी पगडण्डी ऐसा ठौर छू के चलिये
फल फूलते हों जहां प्रेम और संस्कार सपनों का ऐसा कोई गॉव छू के चलिये
जिन्दगी जिन्होंने लिख दी है पथिकों के नाम राह के दरख्तों की छांव छू के चलिये
और पुण्य चारधाम का बनेगा हर एक काम घर से चलो तो मॉ के पांव छू के चलिये ! 


- कवि चरन (Kavi Charan)