Wednesday, 5 June 2013

उंगलिया यूं न सब पर उठाया करो

उंगलिया यूं न सब पर उठाया करो
खर्च करने से पहले कमाया करो

जिन्दगी क्या है खुद ही समझ जाओगे
वारिशों में पतंगें उड़ाया करो

शाम के बाद जब तुम सहर देख लो
कुछ फकीरों को खाना खिलाया करो

दोस्तों से मुलाकात के नाम पर
नीम की पत्तियों को चबाया करो

चॉद सूरज कहां अपनी मन्जिल कहां
ऐसे बेसों को मुंह मत लगाया करो

घर उसी का सही तुम भी हकदार हो
रोज आया करो रोज जाया करो

-साभार राहत इन्‍दौरी साहब 

Monday, 3 June 2013

उसकी कथ्थई आंखों में है जंतर मंतर सब

उसकी कथ्थई आंखों में है जंतर मंतर सब
चाकू बाकू छुरियां वुरियां खंजर बंजर सब

जिस दिन से तुम रूठीं मुझसे रूठे रूठे हैं
चादर वादर तकिया वकिया विस्तर विस्तर सब

मुझसे विछड़के वो भी कहां पहले जैसी है
फीके पड़ गये कपड़े वपड़े जेवर वेवर सब

आखिर में किस दिन डूबूंगा फिकरें करते हैं
दरिया वरिया कश्ती वश्ती लंगर बंगर सब

-राहत इन्‍दौरी साहब (Rahat Indori Sahab)

Wednesday, 22 May 2013

तुमको चाहा और कुछ सोचा नहीं


हमने दुनिया की तरफ देखा नहीं
तुमको चाहा और कुछ सोचा नहीं

दिल कि जैसे पाक मरियम की दुआ
उसके चेहरे पर कोई चहरा नहीं

ख्वाव तो कब के तुम्हारे हो चुके है
एक दिल था वो भी अब मेरा नहीं

तुमने आखिर सुबह से क्या कह दिया
आज सूरज शर्म से निकला नहीं

- श्री आलोक श्रीवास्‍तव (Alok Shrivastv)

असर बुजर्गो की नैमतों का हमारे अन्दर से झॉंकता है


असर बुजर्गो की नैमतों का हमारे अन्दर से झॉंकता है
पुरानी नदिया का मीठा पानी नये समन्दर से झॉंकता है

ना जिस्म कोई, न दिल, न आंखें मगर ये जादूगरी तो देखो
हरेक शह में धड़क रहा है हरेक मंजर से झॉंकता है

लवों पे खामोशियों का पहरा, नजर परेशां, उदास चेहरा
तुम्हारे दिल का हरेक जज्बा तुम्हारे तेवर से झॉंकता है

गले में मॉं ने पहन रक्खे हैं महीन धागे में चन्द मोती
हमारी गर्दिश का हर एक सितारा उस एक जेवर से झॉकता है

थके पिता का उदास चेहरा उभर रहा है यूं मेरे दिल में
कि प्यासे वादल का अक्स जैसे किसी सरोवर से झॉकता है

चहक रहे चमन में पंक्षी दरख्त अंगड़ाई ले रहे है
बदल रहा है दुखों का मौसम बसन्त पतझड़ से झॉंकता है

-श्री आलोक श्रीवास्‍तव (Sh. Alok Shrivastav)

Tuesday, 14 May 2013

जिसके सम्मोहन में पागल धरती है आकाश भी है


जिसके सम्मोहन में पागल धरती है आकाश भी है
एक पहेली—सी दुनिया ये गल्प भी है ​इतिहास भी है

चिंतन के सोपान पे चढ़ कर चॉंद—सितारे छू आये
लेकिन मन की गहराई में माटी की बू—बास भी है

इंद्रधनुष के पुल से गुजर कर इस बस्ती तक आए हैं
जहॉं भूख की धूप सलोनी चंचल है बिंदास भी है

कंकरीट के इस जंगल में फूल खिले पर गंध नहीं
स्मृतियों की घाटी में यूं कहने को मधुमास भी है

—अदम गोंडवी (Adam Gaundvi)