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Tuesday, 12 March 2013

प्रिय तुम्हारी सुधि को मेंने (Priya Tumhari sudhi ko maine)


प्रिय तुम्हारी सुधि को मेंने यूं भी अक्सर झूम लिया
तुम पर गीत लिखा फिर उसका अक्षर अक्षर चूम लिया

में क्या जानूं मन्दिर मस्जिद गिरजा या गुरूद्वारा
जिन पर पहली बार लिखा था अल्हण रूप तुम्हारा
मेंने उन पावन राहों का पत्थर पत्थर चूम लिया
प्रिय तुम्हारी सुधि को मेंने यूं भी अक्सर झूम लिया........तुम पर गीत

हम तुम कितनी दूर धरा से नभ की जितनी दूरी
फिर भी हमने साथ मिलन की पल में कर ली पुरी
मेंने धरती को दुलराया तुमने अम्बर चूम लिया
प्रिय तुम्हारी सुधि को मेंने यूं भी अक्सर झूम लिया..........तुम पर गीत

प्रियतम सुधि की गंध तुम्हारी मेंने चूमी ऐसे
चरण अहिल्या ने रघुवर के चूम लिये थे जैसे
जैसे लकडी की मुरली ने मोहन का स्वर चूम लिया
प्रिय तुम्हारी सुधि को मेंने यूं भी अक्सर झूम लिया........तुम पर गीत

— श्री देवल आशीष श्रंगार रस कवि (Deval Ashish)





गंगाजल सा निर्मल मन है देह नहीं है दर्शन है (Gangajal Sa Nirmal Man hai )


रीत भले है अलग हमारी पर पूजन तो पूजन है
भाव सुमन है गीत भजन है स्वर क्या है अभिनन्दन है
ध्यान बसा वो रूप कि जिसकी छवि तीरथ सी पावन है
गंगाजल सा निर्मल मन है देह नहीं है दर्शन है

रूप कि जिसके आगे वुझकर धूप चॉंदनी होती
हंसदे तो हीरे शरमायें मुस्काये तो मोती
चाल चले तो चरण चूम लें नदिया देख रवानी
बहता पानी पानी पानी होकर मांगे पानी
कंचन काया को छू ले तो और महकता चंदन है
गंगाजल सा निर्मल मन है देह नहीं है दर्शन है
गंगाजल सा निर्मल मन है देह नहीं है दर्शन है...........रीत भले

अलंकार सब रीझे जिस पर उपमायें सब हारी
देख जिसे जयदेव मगन हों वेवस तकें बिहारी
बहके जिसकी एक झलक में अनगिन आंखें प्यासी
जिसके दर्शन पा जायें तो तप छोडें सन्यासी
जिसकी सुधियों में आर्कषण सपनों में सम्मोहन है
गंगाजल सा निर्मल मन है देह नहीं है दर्शन है...........रीत भले

अंग अंग शुभ अंकित जैसे मानस की चौपाई
चिंतन में विस्तार गगन सा गीता सी गहराई
सूरत सुखद नयन में निश्छल नेह करे अगवानी
अमृत पीके अधर उचारे वेद मन्त्र सी बानी
क्या मन्दिर में होगा जैसा अन्तर में आराधन है
गंगाजल सा निर्मल मन है देह नहीं है दर्शन है...........रीत भले

निराकार होकर भी अपने अ​नगिन रूप दिखाये
किन्तु उसे ये आंखों वाली दुनिया देख न पाये
देखे जो दिलवाला कोई तजकर कण्ठी माला
रचना में साकार मिलेगा दुनिया रचने वाला
क्या पत्थर में खोजें उसको जिसकी रचना जीवन है
गंगाजल सा निर्मल मन है देह नहीं है दर्शन है...........रीत भले

— श्रंगार रस कवि देवल आशीष (Deval Ashish)

Monday, 4 March 2013

बस मुझ पर एहसान तुम्‍हारा हो जाये (Bas Mugh par aihsaan tumhara ho jaye)

कि तुम सुमनों की कोमलता, कि तुम हिरनी की चंचलता
कि तुम कलियों की तरूणाई, कि तुम तुलसी की चौपाई -- २

कि प्रिय मेरा तन मन ध्‍यान तुम्‍हारा हो जाये, मेरा तन मन ध्‍यान तुम्‍हारा हो जाये
बस मुझ पर एहसान तुम्‍हारा हो जाये --- कि तुम सुमनों की कोमलता

नयन तुम्‍हारे नयन नहीं है नेह निमन्‍ञण है,
अधर नहीं सौन्‍दर्य सुधा का सहज समपर्ण है
जाने किस के कुशल करों ने तुम्‍हें तराशा है
रूप तुम्‍हारा कोहिनूर है देह वताशा है

तभी तो वो चन्‍द्र किरन अलवेली भटको मत निपट अकेली
जग की अदभुत है लीला हर पंथ वडा पथरीला
फिर भी जीवन पथ आसाना तुम्‍हारा हो जाये
बस मुझ पर एहसान तुम्‍हारा हो जाये --- कि तुम सुमनों की कोमलता

गौर छंटा के श्‍याम घटा के द़श्‍य मनोहर हैं,
चपल चंचला तुम पर मेरे प्राण न्‍यौछावर हैं
तुम्‍हें भला क्‍या दूं जब सब कुछ स्‍वंय तुम्‍हारा हो
तुम्‍हीं प्‍यास हो तुम्‍हीं त़़प्‍ति हो तुम जलधारा हो
सुनो तो फिर वेमन की इच्‍छायें, चिर ग्‍वारीय अभिलाषायें
सब सुख दुख दर्द पुराने रेशम से सपन सुहाने
मेरा ये सारा संसार तुम्‍हारा हो जाये
बस मुझ पर एहसान तुम्‍हारा हो जाये --- कि तुम सुमनों की कोमलता

--श्री श्रंगार रस कवि भाई देवल आशीष (Deval Ashish)


Wednesday, 27 February 2013

बस मुझ पर एहसान तुम्हारा हो जाये (Bas Mugh Par Ahsaan Tumhara ho jaye)


कि तुम सुमनों की कोमलता, कि तुम हिरनी की चंचलता
कि तुम कलियों की तरूणाईत्, तुम तुलसी की चौपाई
कि प्रिय मेरा तन मन ध्यान तुम्हारा हो जाये—2
बस मुझ पर एहसान तुम्हारा हो जाये, कि तुम सुमनों की कोमलता .........

नयन तुम्हारे नयन नहीं है नेह निम्ंत्रण हैं,
अधर नहीं सौन्दर्य सुधा का सहज समर्पण हैं
जाने किस के कुशल करों के तुम्हें तराशा है,
रूप तुम्हारा कोहिनूर है देह बताशा है
तभी तो वो चन्द्रकिरण अलबेली, भटको मत निपट अकेली
जग की अदभुत है लीला, हर पंथ बड़ा पथरीला
फिर भी जीवन पथ आसान तुम्हारा हो जाये
बस मुझ पर एहसान तुम्हारा हो जाये, कि तुम सुमनों की कोमलता .........

गौर छंटा के श्याम घटा के दृश्य मनोहर है,
चपल चंचला तुम पर मेरे प्राण न्यौछावर हैं
तुम्हें भला क्या दूं जब सब कुछ स्वयं तुम्हारा हो,
तुम्हीं प्यास हो तुम्हीं तृप्ति हो तुम जलधारा हो
सुनो तो फिर वेमन की इन्छायें, चिर ग्वारीय अभिलाषायें
सब सुख दुख दर्द पुराने, रेशम से सपन सुहाने
कि मेरा यह सारा अभिमान तुम्हारा हो जाये
बस मुझ पर एहसान तुम्हारा हो जाये, कि तुम सुमनों की कोमलता .........

—श्रंगार रस कवि श्री देवल आशीष (Deval Ashish)

Saturday, 2 February 2013

राधा कृष्ण कविता (Radha Krishn Kavita by Bhai Deval Ashish)


कि विश्व को मोहमयी महिमा के असंख्य स्वरूप दिखा गया कान्हां,
सारथी तो कभी प्रेमी बना तो गुरू धर्म निभा गया कान्हां
रूप विराट धरा तो धरा तो धराहर लोक पे छा गया कान्हां
रूप किया इतना लघु तो यशोदा की गोद में आ गया कान्हां
चोरी छुपे चढ़ बैठा अटारी पे चोरी से माखन खा गया कान्हां
गोपियों के कभी चीर चुराये कभी मटकी चटका गया कान्हां
खाग था घोर बड़ा चितचोर कि चोरी में नाम कमा गया कान्हां
मीरा की रैन की नैन की नींद कि राधा का चैन चुरा गया कान्हां
कि राधा ने त्याग का पंथ बुहारा तो पंथ पर फूल विछा गया कान्हां
राधा ने प्रेम की आन निभायी तो आन का मान वढ़ा गया कान्हां
कान्हां के तेज को भा गयी राधा तो राधा के रूप को भा गया कान्हां
कान्हां को कान्हां बना गयी राधा तो राधा को राधा बना गया कान्हां

कान्हां को कान्हां बना गयी राधा तो ......... राधा को राधा बना गया कान्हां

गोपियॉ गोकुल में ​थी अनेक परन्तु गोपाल को भा गयी राधा
बॉध के पाश में नाग नथैया को काम विजेता बना गयी राधा
कि काम विजेता को प्रेम प्रणेता को प्रेम पीयूष पिला गयी राधा
विश्व को नाच नचाता है जो उस श्याम को नाच नचा गयी राधा
त्यागियों में अनुरागियों में बड़भागी की नाम लिखा गयी राधा
रंग में कान्हां के ऐसी रंगी रंग कान्हां के रंग नहा गयी राधा
प्रेम है भक्ति से बढ़कर ये बात सभी को सिखा गयी राधा
संत महंत तो ध्याया किये और माखनचोर को पा गयी राधा
ब्याही ना श्याम के संग न द्वारिका या मथुरा मिथला गयी राधा
पायी न रूकमणी साधन बैभव सम्पदा को ठुकरा गयी राधा
किन्तु उपाधि और मान गोपाल की रानियों से वढ़ पा गयी राधा
ज्ञानी बड़ी अभिमानी बड़ी पटरानी को पानी पिला गयी राधा
हार के श्याम को जीत गयी अनुराग का अर्थ् बता गयी राधा
पीर पे पीर सहीं पर प्यार को शाश्वत कीर्ति दिला गयी राधा
कान्हां को पा सकती ​थी प्रिया पर प्रीत की रीत निभा गयी राधा
कृष्ण ने लाख कहा पर संग में ना गयी तो फिर ना गयी राधा

कृष्ण ने लाख कहा पर संग में ना गयी......तो फिर ना गयी राधा .......

— भाई श्री देवल आशीष (Deval Ashish)

Friday, 25 January 2013

एक बार जीवन में प्यार कर लो प्रिये..


लगती हो रात में प्रभात की किरन सी
किरन से कोमल कपास की छुवन सी
छुवन सी लगती हो किसी लोकगीत की
लोकगीत जिस में बसी हो गन्ध प्रीत की
तो प्रीत को नमन एक बार कर लो प्रिये

एक बार जीवन में प्यार कर लो प्रिये.................

प्यार ठुकरा के मत भटको विकल सी
विकल हृदय में मचा दो हलचल सी
हलचल प्रीत की मचा दो एक पल को
एक पल में ही खिल जाओगी कमल ​सी
प्यार के सलोने पंख बॉध लो सपन में
सपन को सजने दो चंचल नयन में
नयन झुका के अपना लो किसी नाम को
किसी प्रिय नाम को बसा लो तन मन में
तो मन पे किसी के अधिकार कर लो प्रिये

एक बार जीवन में प्यार कर लो प्रिये .................

प्यार है पवित्रपुंज प्यार पुन्यधाम है
पुण्यधाम जिसमें कि राधिका है श्याम है
श्याम की मुरलिया ही हर गूंज प्यार है
प्यार कर्म, प्यार धर्म, प्यार प्रभु नाम है
प्यार एक प्यास, प्यार अमृत का ताल है
ताल में नहाये हुये चन्द्रमा की चाल है
चाल बन्नवारियों हिरनियों की प्यार है
प्यार देव मन्दिर की आरती का थाल है
तो थाल आरती का है विचार कर लो प्रिये

एक बार जीवन में प्यार कर लो प्रिये .................

प्यार की शरण जाओगी तो तर जाओगी
जाओगी नहीं तो आयु भर पक्षताओगी
पक्षताओगी जो किया आप मान रूप का
रंग रूप यौवन दुबारा नहीं पाओगी।
युगों की जानी अन्जानी पल भर की
अन्जानी जग की कहानी पल भर की
वस पल भर की कहानी इस रूप की
रूप पल भर का जवानी पल भर की
तो अपनी जवानी का श्रंगार कर लो प्रिये

एक बार जीवन में प्यार कर लो प्रिये ................


— श्री देवल आशिष श्रंगार कवि

पूनम के चन्द्रमा की भांति मुख पर चमक


पूनम के चन्द्रमा की भांति मुख पर चमक,
ज्योतसना भी गोरा रंग देख के लजाई है।
सावन के मेघों के समान काली केश राशि,
आंखों में अपार सिन्धु सम गहराई है।
कमल से कोमल गुलाबी अधरों के वीच,
चुपके से मृदु मुस्कान इठलाई है।
बन के उड़े चकोर मन मोर उसी ओर,
चित चोर जब से वह उर में समाई है।

—श्री देवल आशीष जी, कवि श्रंगार

Tuesday, 22 January 2013

अल्हड़ अबोध आयु पाकर दिवाकर सा, रूप काम तन रत नारी लगने लगी


अल्हड़ अबोध आयु पाकर दिवाकर सा, रूप काम तन रत नारी लगने लगी

वॉकुरी की धार सम तीखे नयनों की कोर, आंज कर काजर कटारी लगने लगी

देख कर कंचन समान कमनीय काया, काम को भी कामना कुमारी लगने लगी

यौवन का वोझ इतना वढ़ा कि देह पर, ओढ़नी भी रेशम की भारी लगने लगी


मुखड़ा है जैसे पूर्णिमा के चन्द्रमा की छवि, देहदृष्टि जैसे पारिजात है कसम से

चंचल हंसी में मीठी तान की सी कोयल की, बानी में सुरों की बरसात है कसम से

घोर कालिमा से काले काले—काले कुन्तल हैं, काले केश हैं कि काली रात है कसम से

गोरे रंग से भी गोरी गोरी—गोरी इतनी की, तुलना में गोरा रंग मात है कसम से


झूमर बजी झनननन् कंगन बजे खननन् किनन् किनन् मोतियों के हार बजने लगे

कोमल चरण जो चले तो गन्ध चूम चूम झूमते कनेर कचनार बजने लगे

प्रेती पातकों की चेतना में घन्टियों के स्वर, रूपसी का देश के श्रंगार बजने लगे

नूपुर उधर बार—बार बजने लगे, तो इधर दिलों के तार—तार बजने लगे — 2


— श्रंगार रस कवि श्री देवल आशीष

कि प्यार के बिना भी उम्र काट लेंगे आप किन्तु


कि प्यार के बिना भी उम्र काट लेंगे आप किन्तु
कहीं तो अधूरी जिन्दगानी रह जायेगी
यानी रह जायेगी न मन में तरंग
नाहीं देह पर नेह की निशानी रह जायेगी
रह जायेगी तो वस नाम की नहीं तो ​फिर
और किस काम की जवानी रह जायेगी
रंग जो ना ढंग से उमंग के चढेंगे तो
कबीर सी चन्दरिया पुरानी रह जायेगी

— कवि देवल आशीष

हमने तो बाजी प्यार की हारी ही नहीं है


हमने तो बाजी प्यार की हारी ही नहीं है
जो चॅूंके निशाना वो शिकारी ही नहीं है
कमरे में इसे तू ही बता कैसे सजायें
तस्वीर तेरी दिल से उतारी ही नहीं है।

— कवि देवल आशीष

उलझ के ऐसे मुहब्बत का फलसफा रह जाये



उलझ के ऐसे मुहब्बत का फलसफा रह जाये,
ना कुछ भी ख्वावो हकीकत में फॉसला रह जाये
वहॉ से देखा है तुझको जहॉ से तू खुद भी
जो अपने आपको देखे तो देखता रह जाये।

— कवि देवल आशीष