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Monday, 10 March 2014

कितनी पी कैसे कटी रात मुझे होश नहीं,

कितनी पी कैसे कटी रात मुझे होश नहीं,
रात के साथ गई बात मुझे होश नहीं

मुझको ये भी नहीं मालूम कि जाना है कहॉं
थाम ले कोई मेरा हाथ मुझे होश नहीं

ऑंसूओं और शराबों में गुजारी है हयात
मैं ने कब देखी थी बरसात मुझे होश नहीं

जाने क्‍या टूटा हे पैमाना कि दिल है मेरा
विखरे-विखरे है खयालात मुझे होश नहीं

- डा0 राहत इन्‍दौरी साहब
(Dr. Indori Sahab)

Tuesday, 11 June 2013

बीमार को मरज की दवा देनी चाहिये

बीमार को मरज की दवा देनी चाहिये
में पीना चाहता हूं पिला देनी चाहिये
अल्लाह बरकतों से नवाजेगा इश्क में
है जितनी पूंजी पास लगा देनी चाहिये
में ताज हूं तो ताज को सर पर सजायें लोग

में खाक हूं तो खाक उड़ा देनी चाहिये

कभी दिमाक कभी दिल कभी नजर में रहो
ये सब तुम्हारे ही घर है किसी भी घर में रहो

-साभार राहत इन्‍दौरी साहब 

Monday, 10 June 2013

चलो इश्क करें......

आज हम दोंनों को फुर्सत है चलो इश्क करें
इश्क दोंनों की जरूरत है चलो इश्क करें
इसमें नुकसान का खतरा ही नहीं रहता है
ये मुनाफे की फिजारत है चलो इश्क करे
आप हिन्दु में मुसलमान ये ईसाई वो सिख

यार छोड़ो ये सियासत है चलो इश्क करें......

जाके ये कह दे कोई शोलों से चिंगारी से
फूल इस बार खिले है बड़ी तैयारी से
वादशाहों से भी फेंके हुये सिक्के न लिये
हमने खैरात भी मांगी है तो खुददारी से 

- साभार राहत इन्‍दौरी साहब

Thursday, 6 June 2013

समन्दरों के सफर में हवा चलाता है

समन्दरों के सफर में हवा चलाता है
जहाज खुद नहीं चलते खुदा चलाता है

तुझे खबर नहीं मेले में घूमने वाले
तेरी दुकान कोई दूसरा चलाता है

ये लोग पांव नहीं जहन से अपाहिज है
उधर चलेंगे जिधर रहनुमा चलाता है

हम अपने वूढे चिरागों पे खूब इतराये

और उसको भूल गये जो हवा चलाता है

-साभार राहत इन्‍दौरी साहब 

Wednesday, 5 June 2013

उंगलिया यूं न सब पर उठाया करो

उंगलिया यूं न सब पर उठाया करो
खर्च करने से पहले कमाया करो

जिन्दगी क्या है खुद ही समझ जाओगे
वारिशों में पतंगें उड़ाया करो

शाम के बाद जब तुम सहर देख लो
कुछ फकीरों को खाना खिलाया करो

दोस्तों से मुलाकात के नाम पर
नीम की पत्तियों को चबाया करो

चॉद सूरज कहां अपनी मन्जिल कहां
ऐसे बेसों को मुंह मत लगाया करो

घर उसी का सही तुम भी हकदार हो
रोज आया करो रोज जाया करो

-साभार राहत इन्‍दौरी साहब 

Monday, 3 June 2013

उसकी कथ्थई आंखों में है जंतर मंतर सब

उसकी कथ्थई आंखों में है जंतर मंतर सब
चाकू बाकू छुरियां वुरियां खंजर बंजर सब

जिस दिन से तुम रूठीं मुझसे रूठे रूठे हैं
चादर वादर तकिया वकिया विस्तर विस्तर सब

मुझसे विछड़के वो भी कहां पहले जैसी है
फीके पड़ गये कपड़े वपड़े जेवर वेवर सब

आखिर में किस दिन डूबूंगा फिकरें करते हैं
दरिया वरिया कश्ती वश्ती लंगर बंगर सब

-राहत इन्‍दौरी साहब (Rahat Indori Sahab)

Wednesday, 8 May 2013

आग के पास कभी मोम को लाकर देखूं


आग के पास कभी मोम को लाकर देखूं
हो इजाजत तो तुझे हाथ लगाकर देखूं
दिल का मन्दिर बड़ा वीरान नजर आता है
सोचता हूं तेरी तस्वीर लगाकर देखूं

तूफानों से आंख मिलाओ, शैलाबों पर बार करो
मल्हाओं का चक्कर छोड़ो तैर कर दरिया पार करो
फूलों की दुकानें खोलो खुशबू का व्यापार करो
इश्क खता है तो यह खता एक बार नहीं सौ बार करो

जो जवानियों में जवानी को धूल करते हैं
जो लोग भूल नहीं करते वो भूल करते हैं
अगर अनारकली है शबब बगावत का
सलीम हम तेरी शर्ते कबूल करते हैं

मौसम का ख्याल रक्खा करो कुछ खून में उबाल रक्खा करो
लाख सूरज से दोस्तानां रहे कुछ जुगनू भी पाल रक्खा करो

—राहत इन्दौरी साहब

Saturday, 16 March 2013

Rahat Indori ....


बुलाती है मगर जाने का नहीं
ये दुनिया है इधर जाने का नहीं
मेरे वेटे किसी से इश्क कर
मगर हद से गुजर जाने का नहीं
कुशादा जर्फ होना चाहिये
छलक जाने का भर जाने का नहीं
सितारे नोंच कर ले जाउंगा
में खाली हाथ घर ले जाने का नहीं
वो गर्दन नापता है
नाप ले मगर जालिम से डर जाने का नहीं



— साभार राहत इन्दौरी साहब

Rahat Indori Gajal Part 5



तेरी हरबात मौहब्ब्त में गंवारा करके
दिल के बाजार में बैठे खसारा करके

मुन्तजिर हूं कि सितारों की जरा आंख लगे
चॉद को छत पर बुला लूंगा इशारा करके

आसमानों की तरफ फेंक दिया है मेंने
चंद मिटटी के चिरागों को सितारा करके

में वो दरियां हूं कि हर वूंद भवंर है जिसकी
तुमने अच्छा ही किया मुझसे किनारा करके

— साभार राहत इन्दौरी साहब

Rahat Indori Gajal Part 4


इश्क में जीतके आने के लिये काफी हूं
में निहत्था ही जमाने के लिये काफी हू

मेरी हकीकत को मेरी खाफ समझने वाले
में तेरी नींद उड़ाने के लिये काफी हूं

मेरे बच्चों मुझे दिल खोल के तुम खर्च करो
में अकेला ही कमाने के लिये काफी हूं

एक अखवार हूं औकात ही क्या मेरी
मगर शहर में आग लगाने के लिये काफी हूं

— साभार राहत इन्दौरी साहब

Friday, 15 March 2013

Rahat Indori Gajal Part 3


सुनें कि नई हवाओं की सौहवत विगाड़ देती है
कबूतरों को खुली छत बिगाड़ देती है

जो जुर्म करते हैं इतने बुरे नहीं होते
सजा न देके अदालत बिगाड़ देती है

मिलाना चाहा है इंसा को जो भी इंसा से
तो सारे काम सियासत विगाड़ देती है

हमारे पीर तकीमीर ने कहा था कभी
मियां ये आशिकी इज्जत विगाड़ देती है

सियासत में जरूरी है रवादारी समझता है
वो रोजा तो नहीं रखता पर इफतारी समझता है।

— साभार राहत इन्दौरी साहब

Rahat Indori Gajal Part 2


कश्ती तेरा नसीब चमकदार कर दिया
इस पार के थपेड़ों ने उस पार कर दिया

अफवाह थी कि मेरी तबीयत खराब है
लोगों ने पूछ पूछ कर बीमार कर दिया

दो गज सही मगर ये मेरी मिल्कियत तो है
ऐ मौत तूने मुझ को जमींदार कर दिया

— साभार राहत इन्दौरी साहब ( Rahat Indori )

Rahat Indori Gajal 1


मेरे हुजरे में नहीं और कहीं पर रख दो
आसमां लाये हो ले आये जमीं पर रख दो

अब कहां ढूंढने जाओगे हमारे कातिल
आप तो कत्ल का इल्जाम हमीं पर रख दो

उसने जिस ताक पे कुछ टूटे दीये रक्खे हैं
चॉद तारों को भी ले जाकर वहीं पर रक्ख दो

— साभार राहत इन्दौरी जी (Rahat Indori)