Showing posts with label Alok Srivastav. Show all posts
Showing posts with label Alok Srivastav. Show all posts

Wednesday, 22 May 2013

तुमको चाहा और कुछ सोचा नहीं


हमने दुनिया की तरफ देखा नहीं
तुमको चाहा और कुछ सोचा नहीं

दिल कि जैसे पाक मरियम की दुआ
उसके चेहरे पर कोई चहरा नहीं

ख्वाव तो कब के तुम्हारे हो चुके है
एक दिल था वो भी अब मेरा नहीं

तुमने आखिर सुबह से क्या कह दिया
आज सूरज शर्म से निकला नहीं

- श्री आलोक श्रीवास्‍तव (Alok Shrivastv)

असर बुजर्गो की नैमतों का हमारे अन्दर से झॉंकता है


असर बुजर्गो की नैमतों का हमारे अन्दर से झॉंकता है
पुरानी नदिया का मीठा पानी नये समन्दर से झॉंकता है

ना जिस्म कोई, न दिल, न आंखें मगर ये जादूगरी तो देखो
हरेक शह में धड़क रहा है हरेक मंजर से झॉंकता है

लवों पे खामोशियों का पहरा, नजर परेशां, उदास चेहरा
तुम्हारे दिल का हरेक जज्बा तुम्हारे तेवर से झॉंकता है

गले में मॉं ने पहन रक्खे हैं महीन धागे में चन्द मोती
हमारी गर्दिश का हर एक सितारा उस एक जेवर से झॉकता है

थके पिता का उदास चेहरा उभर रहा है यूं मेरे दिल में
कि प्यासे वादल का अक्स जैसे किसी सरोवर से झॉकता है

चहक रहे चमन में पंक्षी दरख्त अंगड़ाई ले रहे है
बदल रहा है दुखों का मौसम बसन्त पतझड़ से झॉंकता है

-श्री आलोक श्रीवास्‍तव (Sh. Alok Shrivastav)

Monday, 8 April 2013

सखी पिया को जो मैं न देखूं तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां


सखी पिया को जो मैं न देखूं तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां
कि जिन में उनकी ही रोशनी हो कहीं से ला दो मुझे वो अंखिया

दिलों की बातें दिलों के अन्दर जरा सी जिद से दबी हुई हैं
वो सुनना चाहें जुबां से सब कुछ मैं करना चाहूं नजर से वतियां

ये इश्क क्या है, ये इश्क क्या है, ये इश्क क्या है, ये इश्क क्या है 
सुलगती सासें, तरसती आंखें, मचलतीं रूहें धड़कती छतियॉं

उन्हीं की आंखें, उन्हीं का जादू, उन्हीं की हस्ती, उन्हीं की खुशबू 
किसी भी धुन में रमाउं जियरा किसी दरश में पिरोलू अखियां

में कैसे मानूं बरसते नैनो कि तुमने देखा है पी को आते 
न काग बोले, न मोर नाचे, न कूंकी कोयल, न चटकी कलियां

सखी पिया को जो मैं न देखूं तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां...............

—आलोक श्रीवास्तव (Alok Shrivastav)

Thursday, 4 April 2013

अम्मा (Amma)


अम्मा (मॉं) / Amma (Maa)

चिन्तन, दर्शन, जीवन, सर्जन, रूह, नजर पर छायी अम्मा
सारे घर का शोर—शराबा, सूनापन, तन्हाई अम्मा

सारे रिश्ते जेठ—दुपहरी, गर्म—हवा, आतिश—अंगारे
झरना दरिया झील सम्न्दर भीनी सी पुरवाई अम्मा

घर में झीने रिश्ते मेंने लाखों बार उधरते देखे
चुपके चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा

उसने खुद को खोकर मुझमें एक नया आकार लिया है
धरती, अम्बर, आग, हवा, जल जैसी ही सच्चाई अम्मा

बाबूजी गुजरे आपस में सब चीजें तक्सीन हुई जब
मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से आई अम्मा


—आलोक श्रीवास्तव (Alok Shrivastav)




Thursday, 7 March 2013

तुझे नजर न लगे (Tujhe Najar Na lage)


मुददतों खुद की कुछ खबर न लगे,
कोई अच्छा भी इस कदर न लगे
बस तुझे उस नजर से देखा है,
जिस नजर से तुझे नजर न लगे

में जिसे दिल से प्यार करता हूं,
चाहता हूं उसे खबर न लगे
वो मेरा दोस्त भी है दुश्मन भी,
वददुआ दूं उसे पर न लगे

ये सोचना गलत है कि तुम पर नजर नहीं,
मशरूफ हम वहुत हैं मगर वेखबर नहीं
और अव तो खुद अपने खून ने भी साफ कह दिया
में आप का रहुंगा मगर उम्र भर नहीं

- श्री आलोक श्रीवास्‍तव (Alok Srivastav)

सासें भीग जाती हैं (Sansain Bheeg Jati hain)


तुम्हारे पास आता हूं तो सासें भीग जाती हैं,
मुहब्‍बत इतनी मिलती है कि आंखें भीग जाती हैं।

तबस्सुम इत्र जैसा है हंसी बरसात जैसा है,
वो जब भी बात करता है तो वातें भीग जाती हैं।

तुम्हारी याद से दिल में उजाला होने लगता है,
तुम्हें जब गुनगुनाता हूं तो रातें भीग जाती हैं।

जमी की गोद भरती है तो कुदरत भी चहकती है,
नये पत्ते की आहट से ही शाखें भीग जाती हैं।

तेरे एहसास की खुशबू हमेशा ताजा रहती है,
तेरी रहमत की वारिश से मुरादें भीग जाती हैं।

-श्री आलोक श्रीवास्‍तव (Alok Srivastav)

जो हममें तुममें हुई मुहब्बत (Jo Hammain Tummain hui Mohabbat)


जो हममें तुममें हुई मुहब्बत
तो देखो कैसा हुया उजाला
वो खुशबूओं ने चमन संभाला
वो मस्जिदों में खिला तब्स्सुम
वो मुस्कराया है फिर शिवालाय
जो हममें तुममें हुई मुहब्बत................

जो हममें तुममें हुई मुहब्बत
तो लव गुलाबों के फिर से महके
नगर शबाबों के फिर से महके
किसी ने रक्खा है फूल फिर से
वरख्त किताबों के फिर से महके
जो हममें तुममें हुई मुहब्बत.....................

मुहब्बतों की दुकां नहीं है
वतन नहीं है मकां नहीं है
कदम का मीलों निशां नहीं है
मगर बता ये कहां नहीं हैं

कहीं पर गीता कुरान है ये
कहीं पर पूजा अजान है ये
सदाकतों की जुबान है ये
खुला खुला आसमान है ये

तरक्कियों का सामाज जागा
कि बालियों में अनाज जागा
कबुल होने लगी हैं मन्नत
धरा को तकने लगी है जन्नत
जो हममें तुममें हुई मुहब्बत................

-आलोक श्रीवास्तव (Alok Srivastav)