Sunday, 5 May 2013

मैंने आहूति बन कर देखा


मैं कब कहता हूं जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,
मैं कब कहता हूं जीवन—मरू नंदन—कानन का फूल बने
कांटा कठोर है तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है
मैं कब कहता हूं वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने

मैं कब कहता हूं मुझे युद्ध मैं कहीं न तीखी चोट मिले
मैं कब कहता हूं प्यार करूं तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले
मैं कब कहता हूं विजय करूं मेरा उंचा प्रासाद बने
या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली सी याद बने

पथ मेरा प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे
नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे
मैं प्रस्तुत हूं चाहे मिटटी जनपद की धूल बने
फिर उसी धूली का कण—कण भी मेरा गति—रोधक शूल बने

अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है—
क्या वह केवल अवसाद—मलिन झरते आंसू की माला है
वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव—रस का कटु प्याला है
वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन कारी हाला है।

मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया
मैंने आहूति बन कर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है
मैं कहता हूं, मैं बढता हूं, मैं नभ की चोटी चढता हूं
कुचला जाकर भी धूली—सा आंधी सा और उमड़ता हूं

मेरा जीवन ललकार बने, असफलता ही असि—धार बने
इस निर्मम रण में पग—पग का रूकना ही मेरा वार बने
भव सारा तुझको है स्वाहा सब कुछ तप कर अंगार बने
तेरी पुकार सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने

अज्ञेय (Ageya)