Saturday, 4 May 2013

था तुम्हें मैंने रूलाया


था तुम्हें मैंने रूलाया

हा, तुम्हारी मृदुल इच्छा
हाय, मेरी कटु अनिच्छा
था बहुत मॉंगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया
था तुम्हें मैंने रूलाया।

स्नेह का कण तरल था,
मधु न था, न सुधा—गरल था,
एक क्षण को भी, सरलते, क्यों समझ तुमको न पाया
था तुम्हें मैंने रूलाया

बूंद कल की आज सागर,
सोचता हूं बैठ तट पर —
क्यों अभी तक डूब इसमें कर न अपना अंत पाया
था तुम्हें मैंने रूलाया

— बच्चन (Bachhan)